# Bezubaniyon ki Shikayat ये कोई किस्सा दासतां या कहानी नहीं है, एक शिकायत है बेज़ुबानों की, इसलिए मेरी ज़बानी है। कहानियाँ सुनते सुनते नन्हीं गुड़िया अब बड़ी हो गई है। अब कहानियां बनाने की उम्र उसकी है, और उसे भी इस बात की ख़बर हो गई है। और बदलते वक़्त के साथ ये लालटेन एक bulb में बदल गया है। हाथों से झलना वाला पँखा अब ceiling पर टंग गया है। वो मोटा सा घड़ा पानी पी पीकर काफ़ी slim हो गया है। और इन बड़ी बड़ी दीवारों का साइज़ भी अब shrink हो गया है। मगर, मगर मैं गवाह हूँ इस बात का की मैंने इनकी बातें सुनी हैं, इनको अधूरा सा महसूस किया है, और इनकी शिकायतें भी सुनी है। इनका कहना है की इनमे से कोई गुमशुदा है। काफ़ी वक़्त से था साथ जो वो आज कहीं लापता है। और इन्हें शक है के किसी अपने ने इनके साथ धोखा किया है। वैसे तो ये नाम नहीं लेते उसका मगर मुझे इत्तेला ज़रूर किया है। सुनने में ये भी आया है की वो गोल मटोल से telephone, हाँ वही जो तार पकड़ के बैठता था, वो बहुत ही बदल गया है। अब इधर उधर घूमता है वो और काफी अक्लमंद भी होगया है। इस चालबाज़ ने उन कहानियों को कहीं दूर छिपा दिया है। खबर ये भी है की इसने गुड़िया की याददाश्त को मिटा दिया है। ये पँखा ये घड़ा वो दीवारें और लालटेन, सब एक आस लिए बैठें हैं। कोई तो इनकी पुकार सुनले, ये ऐसी दरखास्त लिए बैठे हैं। गुड़िया काफ़ी समझदार है, वो ये सब देखती ज़रूर है, मगर कानों में earphone लगे हैं, शायद इसलिए सुन नहीं पाती। शायद इसलिए सुन नहीं पाती। ---- ***Content by Yamir*** ***Design by Satyaprakash Karsharma***