<style> footer { visibility: hidden; } img { display: block; margin-left: auto; margin-right: auto; } body > .ui-infobar, body > .ui-toc, body > .ui-affix-toc { display: none !important; } body::-webkit-scrollbar { width: 0 !important } body { overflow: -moz-scrollbars-none; } body { -ms-overflow-style: none; } .markdown-body { font-family: "Kohinoor Devnagiri"; text-align:justify; font-size:1.3em; padding-top:0.2em; } .markdown-body h1 { font-size:1.7em; } .markdown-body h2 { padding-top:1em; font-size:1.5em; border-top: 1px solid #eee; border-bottom: 1px solid #fff; } .markdown-body h3 { font-size:1.3em; } #doc.comment-enabled.comment-inner{ margin-right:0px; } .video-container { overflow: hidden; position: relative; width:100%; } .video-container::after { padding-top: 56.25%; display: block; content: ''; } .video-container iframe { position: absolute; top: 0; left: 0; width: 100%; height: 100%; } </style> # परिवर्तिनी एकादशी की पावन व्रत कथा हिंदू धर्म में अन्य एकादशियों के बीच, परिवर्तिनी एकादशी का भी विशेष महत्व है। जितना महत्वपूर्ण यह व्रत है, उतनी ही महत्वपूर्ण इससे जुड़ी हुई कथा भी है। इस कथा के बिना यह व्रत अधूरा होता है, इसलिए आज हम इसकी व्रत कथा आपके लिए लेकर आए हैं। एक बार महाराज युधिष्ठिर को परिवर्तिनी या पार्श्व एकादशी की कथा जानने कि इच्छा हुई, तो उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण के समक्ष अपनी इस इच्छा को प्रकट किया। युधिष्ठिर जी का आग्रह सुनकर श्रीकृष्ण जी ने उनके समक्ष इस पावन व्रत कथा का वाचन शुरू करते हुए कहा कि- त्रेतायुग में बलि नाम का एक असुर हुआ करता था। वह सभी दैत्यों का राजा था, लेकिन वह भगवान श्री विष्णु का परम भक्त भी था, और उनका नित्य पूजन किया करता था। राजा बलि, एक अत्यंत बलशाली, महादानी एवं सत्यवादी राजा के रूप में प्रसिद्ध थे। वह हमेशा ब्राह्मणों का आदर सत्कार किया करते थे, और उन्हें कभी खाली हाथ नहीं लौटने देते थे। एक बार, राजा बलि ने अपनी भक्ति के बल से प्राप्त हुई शक्तियों द्वारा, भगवान इंद्र को परास्त कर, स्वर्ग पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया। देवराज इन्द्र और देवता गण इससे भयभीत होकर, भगवान विष्णु के पास गए और उनसे रक्षा की याचना करने लगे। देवताओं की रक्षा करने हेतु, भगवान विष्णु ने तब, ऋषि कश्यप और माता अदिति के पुत्र के रूप में एक वामन का अवतार लिया। कालांतर में एक दिन जब राजा बलि, अश्वमेध यज्ञ कर रहे थे, तब वहाँ भगवान विष्णु, वामन अवतार में आए और राजा बलि से भिक्षा के लिए याचना करने लगे। ऐसा देख कर, राजा बलि ने बिना विचार किए, ब्राह्मण की प्रार्थना को स्वीकार कर, भिक्षा देने का संकल्प ले लिया। वामन ने तब, दान स्वरूप तीन पग भूमि मांगी। यह सुनकर राजा बलि को थोड़ा आश्चर्य हुआ। दैत्य गुरु शुक्राचार्य ने भी राजा बलि को भगवान विष्णु की लीला से अवगत कराने का प्रयास भी किया, लेकिन राजा बलि दान देने का संकल्प ले चुके थे, इसलिए उन्होंने किसी की भी नहीं सुनी, और वामन को तीन पग भूमि देने का वचन दे दिया। उसके बाद वामन अवतार तीन पग भूमि नापने के लिए आगे बढ़े और देखते ही देखते उन्होंने अपना आकार इतना बड़ा कर लिया कि उन्होंनेे एक पग में पूरी धरती और दूसरे पग में पूरे स्वर्ग को नाप लिया। यह देखकर, सभी लोग एवं देवता गण आश्चर्यचकित रह गए और भगवान विष्णु की स्तुति करने लगे। इसके पश्चात, जब तीसरा पग रखने के लिए कोई भूमि नहीं बची, तब राजा बलि ने विनम्रता पूर्वक अपना मस्तक आगे किया और वामन ने तीसरा पग, उनके सिर पर रख दिया। राजा बलि की वचन प्रतिबद्धता से प्रसन्न होकर, भगवान वामन ने उन्हें पाताल लोक का अधिपति बना दिया और उन्हें वरदान दिया कि, वह सदैव राजा बलि के भवन में निवास करेगें। इसके बाद राजा बलि ने परिवर्तिनी एकादशी के दिन वामन देव की विग्रह की स्थापना की, इसलिए इस एकादशी को वामन एकादशी के नाम से भी जाना जाता हैं। यह वही दिन है जब चातुर्मास के दौरान, योग निद्रा में शयन करते हुए भगवान विष्णु करवट बदलते हैं और इसलिए इसे परिवर्तिनी एकादशी भी कहा जाता है। तो यह थी परिवर्तिनी एकादशी की व्रत कथा, ऐसी ही पौराणिक कथाओं को जानने के लिए, आप श्रीमंदिर से जुड़े रहें।