<style> footer { visibility: hidden; } img { display: block; margin-left: auto; margin-right: auto; } body > .ui-infobar, body > .ui-toc, body > .ui-affix-toc { display: none !important; } body::-webkit-scrollbar { width: 0 !important } body { overflow: -moz-scrollbars-none; } body { -ms-overflow-style: none; } .markdown-body { font-family: "Kohinoor Devnagiri"; text-align:justify; font-size:1.3em; padding-top:0.2em; } .markdown-body h1 { font-size:1.7em; } .markdown-body h2 { padding-top:1em; font-size:1.5em; border-top: 1px solid #eee; border-bottom: 1px solid #fff; } .markdown-body h3 { font-size:1.3em; } #doc.comment-enabled.comment-inner{ margin-right:0px; } .video-container { overflow: hidden; position: relative; width:100%; } .video-container::after { padding-top: 56.25%; display: block; content: ''; } .video-container iframe { position: absolute; top: 0; left: 0; width: 100%; height: 100%; } </style> # वह महान गुरू जिनके भगवान भी बनें शिष्य ![](https://srm-cdn.a4b.io/images/orig/mbqb0rXhaXTosYkzKlWUgSxMdvNb88T5.png?w=1080&h=1080) भारतीय संस्कृति में शिक्षक को गुरु के समतुल्य पूजनीय माना गया है। संत कबीर द्वारा लिखा यह दोहा आप सभी ने अपने स्कूल के दिनों में अवश्य पढ़ा होगा, जिसमें कबीर दास जी गुरु के महत्व को बताते हुए कहते हैं कि- ***“गुरू गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूं पांय।*** ***बलिहारी गुरू आपने गोविन्द दियो बताय।।”*** > इस दोहे का अर्थ है कि - “जब गुरू और गोविंद (भगवान) एक साथ खड़े हों तो किसे प्रणाम करना चाहिए, > गुरू को अथवा गोविन्द को? ऐसी स्थिति में गुरू के श्रीचरणों में शीश झुकाना अधिक उत्तम है क्योंकि उनकी कृपा से गोविन्द के दर्शन का सौभाग्य मिला है।” शिक्षक दिवस के सम्मान जनक अवसर पर हम सभी अपने गुरुओं को याद करते हैं। खास कर स्कूलों में बच्चों को इस दिन का इंतजार साल भर रहता है। यह दिन विशेषकर हमारे शिक्षकों को सम्मान देने का है जिन्होंने हमें जीवन में शिक्षा का महत्व समझाया, हमारी क्षमताओं को पहचाना और हमारे जीवन को एक नई दिशा प्रदान की। आज के समय में जिन्हें हम शिक्षक या टीचर कहते हैं उन्हें प्राचीन भारत में गुरु कहा जाता था। आइए आज उन महागुरुओं के बारे में जानते हैं जिनका उल्लेख हमारी पौराणिक कथाओं में मिलता है। इन महाज्ञानी गुरुओं ने न केवल मनुष्यों और देवताओं को बल्कि परम ईश्वर विष्णु के अवतारों राम और कृष्ण को भी शिक्षा एवं ज्ञान प्रदान किया था। हिन्दू धर्म ग्रंथों के अनुसार पौराणिक कथाओं में महर्षि वाल्मीकि, महर्षि सांदीपनि, महर्षि वेदव्यास, देवगुरु बृहस्पति और दैत्यगुरु शुक्राचार्य को प्रमुख स्थान प्राप्त है। **महर्षि सांदीपनि -** भगवान श्रीकृष्ण और बलराम के गुरु महर्षि सांदीपनि थे। सांदीपनि जी ने ही श्रीकृष्ण को 64 कलाओं की शिक्षा प्रदान की थी। आज भी मध्य प्रदेश के शहर उज्जैन में गुरु सांदीपनि का आश्रम स्थित है। **देवगुरु बृहस्पति -** महर्षि बृहस्पति को देवताओं के गुरु का स्थान दिया गया है। वह एक तपस्वी ऋषि थे। इन्हें 'तीक्ष्णशृंग' भी कहा गया है। युद्ध में अजय होने के कारण योद्धा इनसे विजय पाने के लिए इनका आशीर्वाद लेते थे। बृहस्पति जी सामान्य मनुष्यों को ही नहीं बल्कि देवताओं को भी संकटों से मुक्ति के हल बताते थे। इन्हें गृहपुरोहित भी माना जाता है। चिरकाल में देवगुरु बृहस्पति के बिना कोई यज्ञ-हवन कार्य सफल नहीं माने जाते थे। **महर्षि वेदव्यास -** सनातन धर्म ग्रन्थों में महर्षि वेदव्यास को प्रथम गुरु का स्थान दिया गया है। गुरु पूर्णिमा जैसा महापर्व वेदव्यास जी के जन्म दिवस को समर्पित है। उन्होंने ही वेदों, 18 पुराणों और महाभारत जैसे महाकाव्‍य की रचना की थी। **महर्षि वाल्मीकि -** वाल्मीकि जी भगवान विष्णु के अवतार श्री राम के गुरु थे और उन्होंने रामायण जैसे महाग्रंथ की रचना की थी। वाल्मीकि जी प्राचीन अस्त्र-शस्त्रों के निर्माता भी माने जाते हैं। भगवान राम के साथ ही उनके दोनों पुत्र लव-कुश भी महर्षि वाल्मीकि के शिष्य थे। लव-कुश को अस्त्र-शस्त्र चलाने की शिक्षा महर्षि वाल्मीकि ने ही दी थी। लव-कुश बचपन में ही इतने साहसी और पराक्रमी थे कि उन्होंने महाशक्तिशाली हनुमान जी को ही बंधक बना लिया था। **दैत्यगुरु शुक्राचार्य -** गुरु शुक्राचार्य का वास्तविक नाम ‘शुक्र उशनस’ था। पुराणों के अनुसार वे दैत्यों, असुरों और राक्षसों के गुरु और पुरोहित थे। शुक्राचार्य जी ने भगवन शिव की आराधना कर मृतसंजीवनी विद्या प्राप्त की थी जिसके प्रयोग से उन्हें युद्ध में मृत्यु होने पर मृत योद्धा को पुनः जीवित करने की शक्ति प्राप्त थी। गुरु शुक्राचार्य ने दानवों के साथ देव पुत्रों को भी शिक्षा दी थी। देवगुरु बृहस्पति के पुत्र ‘कच’ इनके ही शिष्य थे, जिन्होंने शुक्राचार्य से संजीवनी विद्या सीखी थी।